Waqt


ऐ ज़िन्दगी लम्हा दो लम्हा संभलने तो दे.
गिरह-ए- ग़म से उम्मीद का धागा सुलझने तो दे.
यहीं कहीं है बहार राहत की,
खारों से भरे शाखों को बहकने तो दे.


चाँद को आज हँसते देखा है,बेबस दिल मचलते देखा है |
खुल के हंसते जो लोग महफ़िल में,उनको चुप-चाप रोते देखा है |पूछते हैं जो खैरीअत सबकी,उनको नश्तर चुभोते देखा है |हमने बरसों से ज़िन्दगी तेरा,लम्हा-लम्हा बिख़रते देखा है |


कितनी मुश्किल से गुजरता है लम्हा-लम्हा,
इक लम्हा भी बिना तुझे याद किए गुजरता नहीं
हमसे पूछो ना किस तरह जीए जाते हैं हम
तुमको सोचूं मैं दिन-रात मगर जी भरता नहीं।



वक्त की आंख से आंसू सा गिरा लम्हा है
दूर तक बहती हुई हर दरिया तन्हा है
आशियां में वो रहती थी दुल्हन बनकर जब से
 वो छोड़ गई है, आईना तन्हा है,


खुश रहते है कोई खफा न हो जाये
मेरी वजह से कोई जुदा न हो जाये
बड़ी मुश्किल से दोस्त बनते है
डर लगता है कही आप हमसे जुदा न हो जाये।



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